15वें वित्त आयोग की राशि से डस्टबिन खरीदी पर उठे सवाल, निकायों से मांगी गई पूरी जानकारी
रायपुर। नगरीय निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के तहत आवास गृहों को निःशुल्क डस्टबिन उपलब्ध कराने के लिए की गई खरीदी अब जांच के दायरे में आती नजर आ रही है। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने प्रदेश के विभिन्न नगरीय निकायों से डस्टबिन खरीदी के संबंध में स्वीकृति और व्यय की विस्तृत जानकारी मांगी है।
संचालनालय, नगरीय प्रशासन एवं विकास, अटल नगर नवा रायपुर की ओर से 11 सितंबर 2026 को जारी पत्र में 15वें वित्त आयोग मद के टाइड ग्रांट (ठोस अपशिष्ट प्रबंधन) के अंतर्गत आवास गृहों को निःशुल्क वितरण के लिए डस्टबिन क्रय हेतु अनियमित स्वीकृति के संबंध में जानकारी मांगी गई है। पत्र में भारतीय लेखा परीक्षा विभाग के सहायक लेखापरीक्षा अधिकारी (ए.एम.जी.-II) की ऑडिट ऑब्जर्वेशन रेफरेंस क्रमांक 06 (OBS-2565360), दिनांक 13 अगस्त 2026 का भी उल्लेख किया गया है।
संचालनालय ने संबंधित क्षेत्रीय कार्यालयों और निकायों से निर्धारित प्रारूप में जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। इसमें वर्षवार निकाय का नाम, योजना का नाम, संचालनालय की स्वीकृति क्रमांक एवं दिनांक, खरीदे गए डस्टबिन की संख्या, स्वीकृत राशि और वास्तविक व्यय की जानकारी मांगी गई है।
पत्र के साथ भेजे गए प्रारूप में 2016-17 से 2025-26 तक की अवधि के लिए जानकारी मांगी गई है। वहीं 15वें वित्त आयोग की अनुदान राशि से डस्टबिन खरीदी से संबंधित अलग प्रारूप में 2020-21 से 2025-26 तक की जानकारी मांगी गई है। दोनों प्रारूपों में स्वीकृत राशि और व्यय राशि सहित डस्टबिन की संख्या का विवरण दर्ज किया जाना है।
समय सीमा में जानकारी देने के निर्देश
संचालनालय ने संबंधित अधिकारियों को उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर जानकारी सत्यापित प्रति और सॉफ्ट कॉपी सहित उपलब्ध कराने को कहा है, ताकि महालेखाकार कार्यालय को समय-सीमा में जानकारी भेजी जा सके। इसके लिए ई-मेल के माध्यम से भी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। पत्र की प्रतिलिपि आयुक्त, नगर पालिका निगम एवं मुख्य नगर पालिका अधिकारी, नगर पालिका परिषद/नगर पंचायत तथा प्रोग्रामर, डेटा सेंटर को आवश्यक कार्रवाई और वेबसाइट पर अपलोड करने के लिए भेजी गई है।
खास बात यह है कि उपलब्ध प्रारूप में अभी किसी निकाय की राशि या डस्टबिन की संख्या दर्ज नहीं है। इसलिए दस्तावेज के आधार पर फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि किन-किन निकायों में कितनी राशि से खरीदी हुई और किस मामले में अनियमित स्वीकृति का ऑडिट ऑब्जर्वेशन किया गया है।
