परंपरा बचाने आगे आईं गांव की बेटियां, राम भी बनीं और रावण भी, देखे फोटो में

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बालोद के चारवाही गांव में तीन साल से बालिकाएं कर रहीं रामलीला का मंचन, दमदार संवाद और सशक्त अभिनय से दर्शकों को कर रहीं मंत्रमुग्ध
बालोद। भगवान श्रीराम की मर्यादा, त्याग और धर्म की विजय की गाथा जब मंच पर जीवंत होती है, तो दर्शक भक्ति में डूब जाते हैं। लेकिन बालोद जिले के ग्राम चारवाही की रामलीला कुछ खास है। यहां रामलीला के मंच पर पुरुष नहीं, बल्कि गांव की बेटियां भगवान श्रीराम से लेकर रावण तक की भूमिका निभा रही हैं। राम भी बेटी, रावण भी बेटी और बाकी पात्रों को भी गांव की बालिकाएं ही निभाती हैं। अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली संवाद अदायगी और शानदार अभिनय से ये बेटियां दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर रही हैं।


जब बेटियों ने कहा- रामलीला बंद नहीं होने देंगे
चारवाही गांव में वर्षों से रामलीला के आयोजन की परंपरा चली आ रही है। समय के साथ जब रामलीला के पात्रों की कमी होने लगी, तब तीन साल पहले इसके मंचन पर विराम लगने की नौबत आ गई। ऐसे समय में गांव की बेटियों ने आगे आकर इस धार्मिक परंपरा को बचाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने साफ कहा कि वे रामलीला की परंपरा को टूटने नहीं देंगी। इसके बाद बालिकाओं ने स्वयं विभिन्न पात्रों की जिम्मेदारी संभाली और रामलीला का मंचन फिर से शुरू हो गया।
राम से रावण तक, हर किरदार में बेटियों का दम
गांव की बालिकाओं की इस रामलीला में करीब 20 पात्रों की भूमिका बेटियां ही निभाती हैं। भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण सहित विभिन्न पात्रों को मंच पर जीवंत करने के लिए उन्हें संवाद, हाव-भाव और अभिनय का अभ्यास करना पड़ता है। उनकी प्रस्तुति में आत्मविश्वास और समर्पण साफ दिखाई देता है। यही वजह है कि ग्रामीणों के बीच इस रामलीला को लेकर खास आकर्षण बना हुआ है।
आस्था के साथ महिला सशक्तीकरण की मिसाल
चारवाही की बेटियों की यह पहल केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक सोच में बदलाव और बेटियों की प्रतिभा का भी उदाहरण है। जहां पात्रों की कमी के कारण वर्षों पुरानी परंपरा समाप्त होने की कगार पर थी, वहीं बेटियों ने अपनी इच्छाशक्ति से उसे नई जिंदगी दे दी। उन्होंने साबित किया कि परंपराओं को आगे बढ़ाने के लिए इच्छाशक्ति और समर्पण जरूरी है, न कि किसी एक वर्ग या लिंग की भागीदारी।
बालिका रामलीला मंडली के संचालनकर्ता सूबेलाल साहू और सदस्य मनीष कुमार के अनुसार, गांव में लंबे समय से रामलीला का आयोजन होता रहा है। तीन साल पहले पात्रों की कमी के कारण मंचन बंद होने की स्थिति बनी, लेकिन गांव की बेटियों ने जिम्मेदारी संभालकर इस परंपरा को फिर से जीवित कर दिया।
चारवाही की इन बेटियों ने रामलीला के मंच से एक संदेश दिया है—आस्था की ज्योति तभी जलती रहती है, जब उसे आगे बढ़ाने वाले हाथ पीछे नहीं हटते। गांव की बेटियां आज न केवल भगवान श्रीराम की कथा सुना रही हैं, बल्कि अपनी कला, साहस और संकल्प से समाज के सामने एक प्रेरक उदाहरण भी प्रस्तुत कर रही है।

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