ढाई साल बाद भी घोषणा पत्र का वादा अधूरा, अनियमित कर्मचारियों में बढ़ रहा आक्रोश
नियमितीकरण समेत अन्य मांगों को लेकर आंदोलन की तैयारी, समिति बनने के बाद भी निर्णय का इंतजार
रायपुर।
भाजपा सरकार के गठन के करीब ढाई साल बाद भी विभागों में कार्यरत अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण का मुद्दा जस का तस बना हुआ है। चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में अनियमित कर्मचारियों की समस्याओं के निराकरण और नियमितीकरण की दिशा में 100 दिन के भीतर कार्रवाई का वादा किया था, लेकिन सरकार के कार्यकाल का लंबा समय गुजरने के बाद भी इस दिशा में ठोस निर्णय नहीं होने से कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।
प्रदेश के विभिन्न विभागों, निगम-मंडलों और शासकीय संस्थानों में बड़ी संख्या में अनियमित, संविदा, दैनिक वेतनभोगी और अन्य श्रेणी के कर्मचारी लंबे समय से सेवाएं दे रहे हैं। कर्मचारी संगठनों का दावा है कि प्रदेश में तीन लाख से अधिक अनियमित कर्मचारी अपने नियमितीकरण और सेवा संबंधी अन्य मांगों को लेकर सरकार से उम्मीद लगाए बैठे हैं।
समिति बनी, लेकिन निर्णय अब तक नहीं
अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण सहित उनकी मांगों पर विचार के लिए सरकार की ओर से समिति का गठन भी किया गया था। समिति को कर्मचारियों की स्थिति, नियमों और नियमितीकरण की संभावनाओं का अध्ययन कर सुझाव देने की जिम्मेदारी दी गई थी। समिति बने लंबा अरसा गुजर चुका है, लेकिन अब तक अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। यही वजह है कि कर्मचारी संगठनों में अब असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
कर्मचारियों का कहना है कि चुनाव के समय किए गए वादे के बाद उन्हें उम्मीद थी कि सरकार बनने के बाद जल्द ही उनकी वर्षों पुरानी समस्या का समाधान होगा। 100 दिन में कार्रवाई की बात कही गई थी, लेकिन अब ढाई साल के करीब समय बीतने के बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
अब आंदोलन की राह पर कर्मचारी
नियमितीकरण के साथ वेतन विसंगति दूर करने, सेवा सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और अन्य लंबित मांगों को लेकर कर्मचारी संगठन अब आंदोलन की रणनीति बनाने में जुट गए हैं। संगठनों का कहना है कि सरकार से लगातार मांग और बातचीत के बावजूद यदि ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो प्रदेशव्यापी आंदोलन किया जाएगा।
कर्मचारी नेताओं का कहना है कि अनियमित कर्मचारी वर्षों से विभागों में नियमित कर्मचारियों के समान ही जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें नौकरी की स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। ऐसे में सरकार को समिति की रिपोर्ट और कर्मचारियों की मांगों पर जल्द फैसला लेना चाहिए।
वादे से निर्णय तक बढ़ता इंतजार
भाजपा के घोषणा पत्र में 100 दिन में कार्रवाई के वादे से लेकर समिति गठन और अब तक निर्णय नहीं होने के बीच कर्मचारियों का इंतजार लंबा होता जा रहा है। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह घोषणा पत्र के इस वादे पर कब और किस रूप में फैसला करती है। कर्मचारियों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और कर्मचारी संगठनों के आंदोलन का बड़ा विषय बन सकता है।
