भक्तों को बाबा नीब करौरी का संदेश—ईश्वर स्मरण के साथ परिवार के प्रति कर्तव्य भी सच्ची भक्ति
भक्तों को बाबा नीब करौरी का संदेश—ईश्वर स्मरण के साथ परिवार के प्रति कर्तव्य भी सच्ची भक्ति
कैंची धाम में सत्संग के दौरान बाबा ने कहा—परिवार की चिंता और सेवा से ही सार्थक होता है मानव जीवन
कैंची धाम। बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन से जुड़े प्रसंगों में भक्ति के साथ-साथ परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य निभाने का संदेश भी मिलता है। ऐसा ही एक प्रसंग कैंची धाम आश्रम में सत्संग के दौरान सामने आया, जब बाबा ने अपने भक्तों को समझाते हुए कहा कि मनुष्य को नियमित रूप से धर्म और ईश्वर का विचार करते रहना चाहिए। ईश्वर का स्मरण ही जीवन की सच्ची भक्ति है, लेकिन इसके साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाना भी उतना ही आवश्यक है।
बाबा का संदेश था कि जो लोग गृहस्थ जीवन में हैं, उन्हें अपने परिवार का हिस्सा बनकर रहना चाहिए। परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं, अपेक्षाओं और सुख-दुख का ध्यान रखना भी भगवान की सेवा का ही एक रूप है। केवल पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांड ही भक्ति नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना भी मानव जीवन को सफल बनाता है।
तीर्थ यात्रा में सामने आया बाबा का अद्भुत प्रसंग
बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन से जुड़ा एक अन्य प्रसंग उनके एक भक्त की तीर्थ यात्रा का है। यात्रा के दौरान पैसे की कमी के बावजूद बाबा के साथ रहने वाले भक्तों को भोजन-पानी की कमी का अनुभव नहीं होता था। किसी न किसी रूप में उनके लिए भोजन की व्यवस्था हो जाती।
एक दिन एक भक्त बाबा के लिए भोजन लेकर आया। बाबा भोजन करने लगे। उसी दौरान उन्होंने कुछ दूरी पर बैठे एक भक्त को देखा और अपने पास बुलाया। बाबा ने उसे थोड़ा भोजन देते हुए सहज लेकिन कुछ नाराजगी भरे अंदाज में कहा—तुम तो हर समय खाते ही रहते हो। अपने परिवार को छोड़कर यहां आए हो। घर पर पत्नी है, उसकी कुछ चिंता भी है या नहीं?
इतना कहकर बाबा शांत हो गए।
भक्त बाबा के इन शब्दों को सुनकर सोच में पड़ गया। उसे समझ नहीं आया कि बाबा ने ऐसा क्यों कहा। आखिर उसकी पत्नी घर पर किस स्थिति में होगी? यह सवाल उसके मन में उठता रहा।
घर पहुंचने पर खुला बाबा के वचन का रहस्य
जब वह भक्त बाद में अपने घर पहुंचा तो उसकी पत्नी ने जो बात बताई, उसे सुनकर वह स्तब्ध रह गया। पत्नी ने बताया कि घर में उन दिनों खाने-पीने की कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। वह कई किलोमीटर दूर तक परेशान होकर भोजन की व्यवस्था के लिए भटकती रही।
इसी बीच पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति ने उसके बच्चों के लिए भोजन बनाकर उन्हें खिलाया। संकट की उस घड़ी में पड़ोसी की मदद से परिवार का पेट भर सका।
भक्त को बाबा के वे शब्द याद आ गए—”तुम्हारे परिवार की भी चिंता करो।”
उसे महसूस हुआ कि बाबा उससे दूर रहकर भी उसके परिवार की स्थिति से परिचित थे। भक्त की श्रद्धा और गहरी हो गई। उसने इसे बाबा की कृपा और उनके सर्वव्यापी स्वरूप का अनुभव माना।
बाबा का संदेश—सेवा ही सबसे बड़ी साधना
बाबा नीब करौरी महाराज के जीवन से जुड़े ऐसे प्रसंगों में एक बात बार-बार दिखाई देती है कि उनकी दृष्टि में भक्ति केवल मंदिर, आश्रम या पूजा तक सीमित नहीं थी। वे सेवा, प्रेम और जिम्मेदारी को भी आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते थे।
उनका संदेश यही था कि ईश्वर का स्मरण करते हुए अपने परिवार, समाज और जरूरतमंदों की सेवा करनी चाहिए। गृहस्थ व्यक्ति यदि अपने परिवार की जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर केवल धार्मिक गतिविधियों में लगा रहे तो भक्ति अधूरी है। सच्ची साधना वही है जिसमें भगवान का स्मरण और मानव सेवा साथ-साथ चले।
यही कारण है कि बाबा से जुड़े भक्त आज भी उनके प्रसंगों को केवल चमत्कार की कथा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली सीख के रूप में याद करते हैं।
