संक्रामक बीमारियों की पहचान से वैक्सीन रिसर्च तक, छत्तीसगढ़ में बढ़ेंगी स्वास्थ्य सुरक्षा की संभावनाएं
रायपुर के कृषि विश्वविद्यालय में स्थापित हुई बीएसएल-3 प्रयोगशाला, पशुओं से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों की निगरानी और अनुसंधान को मिलेगी गति
रायपुर।
संक्रामक बीमारियों की समय पर पहचान, उनके फैलाव को समझने और रोकथाम के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान अब छत्तीसगढ़ में नई दिशा ले सकेगा। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर परिसर में अत्याधुनिक बायोसेफ्टी लेवल-3 (बीएसएल-3) प्रयोगशाला स्थापित की गई है। इससे गंभीर संक्रामक रोगों के अध्ययन, उन्नत जांच तकनीकों के विकास और वैक्सीन व उपचार से जुड़े अनुसंधान की संभावनाएं बढ़ेंगी। इसका लाभ कृषि, पशुपालन और मानव स्वास्थ्य से जुड़े क्षेत्रों को मिल सकता है।
पशुओं से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों पर विशेष नजर
पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियां यानी जूनोटिक रोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती हैं। ऐसी बीमारियों की निगरानी और समय रहते पहचान होने से संक्रमण के संभावित प्रसार को रोकने की तैयारी मजबूत की जा सकती है। बीएसएल-3 प्रयोगशाला में निर्धारित जैव-सुरक्षा मानकों के अनुरूप संक्रामक रोगजनकों का अध्ययन किया जा सकेगा। इससे वैज्ञानिकों को रोगों की प्रकृति समझने और बेहतर जांच व रोकथाम के उपाय विकसित करने में मदद मिलेगी।
छत्तीसगढ़ जैसे कृषि और पशुपालन आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्य में इस सुविधा का महत्व और बढ़ जाता है। पशुओं में फैलने वाले संक्रमण का असर पशुपालकों की आजीविका, दुग्ध उत्पादन और कृषि आधारित गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। ऐसे में रोगों की निगरानी और वैज्ञानिक समाधान विकसित करने की क्षमता मजबूत होना किसानों और पशुपालकों के हित में महत्वपूर्ण कदम है।
क्या है बीएसएल-3 प्रयोगशाला की खासियत?
बीएसएल-3 प्रयोगशाला ऐसी उच्चस्तरीय सुविधा है, जिसे निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत उन संक्रामक रोगजनकों के अध्ययन के लिए तैयार किया जाता है, जिनसे गंभीर बीमारी का खतरा हो सकता है और जो सांस के जरिए संक्रमण फैला सकते हैं। इसमें नियंत्रित वातावरण, विशेष सुरक्षा व्यवस्था और प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत होती है। इसका उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ प्रयोगशाला कर्मियों और आसपास के वातावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
इस तरह की सुविधा से रोगों की पहचान के लिए उन्नत तकनीकों पर काम करने, संक्रमण की प्रकृति का अध्ययन करने और वैक्सीन व उपचार संबंधी शोध को आगे बढ़ाने के अवसर मिलते हैं। हालांकि, इन क्षेत्रों में वास्तविक उपलब्धियां प्रयोगशाला की कार्यक्षमता, स्वीकृत अनुसंधान परियोजनाओं और वैज्ञानिक टीम की गतिविधियों पर निर्भर करेंगी।
वन हेल्थ की अवधारणा को मिलेगा आधार
मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हैं। इसी सोच को ‘वन हेल्थ’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य इंसानों, पशुओं और पर्यावरण से संबंधित स्वास्थ्य चुनौतियों को एक साथ समझकर समाधान तलाशना है। नई प्रयोगशाला इस दिशा में कृषि वैज्ञानिकों, पशु स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अन्य शोधकर्ताओं के बीच समन्वय बढ़ाने में मदद कर सकती है।
प्रयोगशाला की स्थापना छत्तीसगढ़ बायोटेक प्रमोशन सोसायटी द्वारा नवनिर्मित सुभाषचंद्र बोस बायोटेक इन्क्यूबेशन सेंटर के अंतर्गत की गई है। इसका लोकार्पण 28 सितंबर को किया गया था। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस पहल को राज्य में वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक प्रयोगशाला सुविधाओं के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति एवं छत्तीसगढ़ बायोटेक प्रमोशन सोसायटी के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. गिरीश चंदेल के प्रयासों की सराहना की।
वैज्ञानिकों और शोधार्थियों को मिलेंगे नए अवसर
नई सुविधा से वैज्ञानिकों, शोधार्थियों, प्रयोगशाला तकनीशियनों और संबंधित विशेषज्ञों को उच्च जैव-सुरक्षा मानकों के अनुरूप अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के अवसर मिल सकते हैं। विश्वविद्यालय में पहले से संचालित फाइटोसैनिटरी प्रयोगशाला कृषि नमूनों, मृदा, जल और फसल अवशेषों के परीक्षण में योगदान दे रही है। बीएसएल-3 प्रयोगशाला जुड़ने से अनुसंधान के दायरे को विस्तार देने की संभावनाएं बनेंगी।
मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई है कि यह सुविधा संक्रामक रोगों की निगरानी, जैव-सुरक्षा, पशु एवं जूनोटिक रोगों के अध्ययन और रोग प्रकोप से निपटने की तैयारियों में उपयोगी साबित होगी। अब इस उपलब्धि का वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रयोगशाला में अनुसंधान गतिविधियां कितनी प्रभावी ढंग से संचालित होती हैं और उनके निष्कर्ष आम लोगों, किसानों तथा पशुपालकों तक किस तरह पहुंचते हैं।
