किसी भी व्यक्ति को नार्को टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता
स्वेच्छा और कानूनी प्रक्रिया के बिना नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग जैसे परीक्षण कराना मौलिक अधिकारों के खिलाफ
बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध नार्को टेस्ट कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट और ब्रेन मैपिंग जैसे वैज्ञानिक परीक्षण केवल संबंधित व्यक्ति की स्वैच्छिक सहमति से ही कराए जा सकते हैं। किसी को जबरन ऐसे परीक्षण के लिए विवश करना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच एजेंसियां किसी मामले की जांच के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का सहारा ले सकती हैं, लेकिन इसके लिए संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति आवश्यक है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को स्वयं अपने खिलाफ साक्ष्य देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व के फैसलों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि नार्को टेस्ट के दौरान दिए गए कथनों को स्वतः साक्ष्य नहीं माना जा सकता। ऐसे परीक्षण तभी स्वीकार्य हैं जब वे पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया और व्यक्ति की सहमति के अनुरूप कराए गए हों।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता के अधिकार और निष्पक्ष जांच की संवैधानिक व्यवस्था को और मजबूती देता है। भविष्य में जांच एजेंसियों को नार्को टेस्ट कराने से पहले संबंधित व्यक्ति की स्पष्ट सहमति और न्यायालय द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा।
यह निर्णय उन मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां जांच के दौरान आरोपी या संदिग्ध पर नार्को टेस्ट कराने का दबाव बनाया जाता है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध ऐसे परीक्षण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
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