सांवले रंग और प्राइवेट नौकरी के तानों का आरोप साबित नहीं, हाईकोर्ट ने तलाक का आदेश किया निरस्त

0


छोटे-मोटे वैवाहिक मतभेद या सामान्य नोक-झोंक को क्रूरता नहीं माना जा सकता : हाईकोर्ट
बिलासपुर। पति-पत्नी के बीच होने वाले सामान्य वैवाहिक मतभेद, छोटी-मोटी नोक-झोंक या घरेलू विवाद को हर स्थिति में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। एक महत्वपूर्ण मामले में हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दिए गए तलाक के आदेश को निरस्त करते हुए पत्नी की अपील स्वीकार कर ली है। अदालत ने कहा कि पति की ओर से लगाए गए आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित किया जाना आवश्यक है।
मामले में पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी उसके सांवले रंग को लेकर ताने देती थी और उसकी प्राइवेट नौकरी को लेकर भी उसे अपमानित करती थी। इन कथित व्यवहारों को आधार बनाते हुए पति ने वैवाहिक संबंध विच्छेद की मांग की थी। निचली अदालत ने पति के पक्ष में फैसला देते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी थी।
इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। पत्नी की ओर से दलील दी गई कि पति द्वारा लगाए गए आरोप महज आरोप हैं और उन्हें साबित करने के लिए पर्याप्त एवं विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किए गए हैं। वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य कहासुनी अथवा मतभेद को क्रूरता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि पत्नी द्वारा पति के सांवले रंग अथवा उसकी प्राइवेट नौकरी को लेकर लगातार अपमानित किए जाने के आरोप पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं हुए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ आरोप लगा देना क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सामान्य नोक-झोंक को नहीं कह सकते क्रूरता
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि पति-पत्नी के बीच होने वाले छोटे-मोटे मतभेद और सामान्य वैवाहिक नोक-झोंक वैवाहिक जीवन का हिस्सा हो सकते हैं। प्रत्येक विवाद या असहमति को मानसिक क्रूरता मानकर विवाह समाप्त नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि तलाक जैसे गंभीर मामले में क्रूरता के आरोपों का परीक्षण परिस्थितियों, व्यवहार की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल सामान्य वैवाहिक मतभेदों के आधार पर तलाक की डिक्री पारित करना उचित नहीं है।
पत्नी की अपील स्वीकार, तलाक का आदेश निरस्त
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करते हुए तलाक की डिक्री को निरस्त कर दिया और पत्नी की अपील स्वीकार कर ली। इस फैसले में अदालत ने एक बार फिर रेखांकित किया कि वैवाहिक संबंधों में हर असहमति या सामान्य तकरार को क्रूरता का कानूनी आधार नहीं बनाया जा सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *