20 साल की सेवा, फिर भी वेतन वहीं का वहीं: छत्तीसगढ़ के लाखों अनियमित कर्मचारियों का दर्द अब आक्रोश में बदला

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रायपुर।

छत्तीसगढ़ के सरकारी विभागों, नगरीय निकायों और विभिन्न संस्थानों में वर्षों से काम कर रहे प्लेसमेंट और अनियमित कर्मचारियों की जिंदगी आज भी कम वेतन, अस्थिर रोजगार और आर्थिक तंगी के बीच गुजर रही है। कई कर्मचारी ऐसे हैं, जो 20 से 25 साल से लगातार एक ही विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन उनकी आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। दूसरी ओर, उनके साथ काम करने वाले नियमित कर्मचारियों के वेतन में समय-समय पर महंगाई भत्ता, वेतनवृद्धि और अन्य सुविधाओं के जरिए बढ़ोतरी होती रही।
जानकारी के मुताबिक, प्रदेश के विभिन्न विभागों में प्लेसमेंट और अनियमित कर्मचारियों की संख्या करीब 6 लाख के आसपास बताई जाती है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है, जिन्हें करीब 10 से 20 हजार रुपये के आसपास मासिक भुगतान मिलता है। कई मामलों में भुगतान एजेंसी के माध्यम से होने के कारण कर्मचारियों का आरोप है कि एजेंसी और विभागीय व्यवस्था के बीच उनकी मेहनत की पूरी राशि उन तक नहीं पहुंच पाती।
एक ही दफ्तर, एक ही काम… लेकिन सुविधाओं में जमीन-आसमान का अंतर
इन कर्मचारियों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब वे वर्षों से नियमित कर्मचारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं, तो उनके वेतन और सुविधाओं में इतना बड़ा अंतर क्यों है? सुबह से शाम तक कार्यालय, अस्पताल, नगरीय निकाय, सफाई व्यवस्था, तकनीकी कार्य और अन्य जिम्मेदारियां संभालने वाले कर्मचारियों का कहना है कि जिम्मेदारी बढ़ती गई, लेकिन आमदनी नहीं बढ़ी।
कई परिवारों की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि महीने का वेतन आने से पहले ही राशन, बच्चों की फीस, बिजली बिल और बुजुर्ग माता-पिता की दवाइयों का खर्च सामने खड़ा हो जाता है। कभी-कभी वेतन में देरी होने पर कर्मचारियों को किराना तक उधार लेना पड़ता है। कुछ परिवारों को दो-तीन महीने तक भुगतान का इंतजार करने की मजबूरी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में साहूकार से कर्ज लेकर घर चलाना उनकी मजबूरी बन जाता है।
मांगें उठीं, ज्ञापन दिए, धरने हुए… लेकिन समाधान अब भी दूर
प्लेसमेंट और अनियमित कर्मचारी लंबे समय से नियमितीकरण, समान काम के लिए सम्मानजनक वेतन, समय पर भुगतान और सामाजिक सुरक्षा जैसी मांगें उठाते रहे हैं। सरकार और प्रशासन को कई बार ज्ञापन दिए गए। धरना-प्रदर्शन और आंदोलन भी हुए, लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया है।
अब वर्षों से उपेक्षा का सामना कर रहे कर्मचारियों का धैर्य जवाब देने लगा है। कर्मचारियों के बीच यह चर्चा तेज हो रही है कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो आगामी चुनावों में वे अपने मुद्दों को राजनीतिक रूप से सामने रखेंगे और वादे करने वाले नेताओं तथा राजनीतिक दलों से जवाब मांगेंगे।
परिवार की जरूरतों और भविष्य के बीच फंसी जिंदगी
इन कर्मचारियों की कहानी केवल नौकरी और वेतन की नहीं, बल्कि उन परिवारों की कहानी है जो सीमित आमदनी में अपना भविष्य संवारने की कोशिश कर रहे हैं। किसी कर्मचारी के घर बच्चे की स्कूल फीस बाकी है, किसी के घर बुजुर्ग मां की दवा खत्म होने वाली है तो किसी के सामने महीने का राशन जुटाने की चुनौती है।
सालों की सेवा के बाद भी यदि कर्मचारी अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करे, तो यह केवल उसका व्यक्तिगत संकट नहीं बल्कि व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा सवाल है। अब प्रदेश के लाखों प्लेसमेंट और अनियमित कर्मचारी सरकार से सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि सम्मानजनक वेतन, समय पर भुगतान, सामाजिक सुरक्षा और अपने भविष्य की ठोस गारंटी की उम्मीद कर रहे हैं।

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