शादीशुदा बेटी को भी अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार, हाईकोर्ट का अहम फैसला
बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर बेटी को नौकरी के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में महिला कर्मचारी के साथ उसके वैवाहिक status के आधार पर भेदभाव करना समानता के अधिकार की भावना के विपरीत है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित बैंक को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के मामले पर पुनर्विचार करते हुए 90 दिनों के भीतर अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी कर नियुक्ति प्रदान की जाए। कोर्ट के इस आदेश को उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां शासकीय या बैंक कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनकी शादीशुदा बेटियां परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।
याचिका में बताया गया था कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनकी बेटी ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। हालांकि, शादीशुदा होने के आधार पर उनके दावे पर आपत्ति जताई गई और नियुक्ति से वंचित कर दिया गया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी महिला को केवल इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से बाहर नहीं किया जा सकता कि वह विवाहित है। अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को आर्थिक संकट से राहत देना है। ऐसे में पात्रता का निर्धारण वास्तविक परिस्थितियों और लागू नियमों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल महिला की वैवाहिक स्थिति के आधार पर।
कोर्ट के इस निर्णय से अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलने की उम्मीद है। खासकर उन मामलों में, जहां विवाहित बेटी अपने माता-पिता के परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी निभा रही है, यह फैसला एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन सकता है।
हाईकोर्ट ने संबंधित बैंक को 90 दिन के भीतर नियुक्ति संबंधी आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। फैसले के बाद अनुकंपा नियुक्ति में शादीशुदा बेटियों के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर नई कानूनी बहस को भी बल मिला है।
