बुमला बॉर्डर: जहां हवा में तैरती हैं शौर्य की गाथाएं,पहाड़ों के बीच धड़कता है विकास का नया भविष्य
Tushar saahu, वांग (तवांग), अरुणाचल प्रदेश से लौटकर..
समुद्रतल से 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित बुमला बॉर्डर भारत-चीन सीमा का वह दुर्गम स्थान, जहां हर पत्थर, हर हवा का झोंका, हर मोड़ अपने भीतर शौर्य और बलिदान की अनगिनत कहानियां समेटे बैठा है।
ईटानगर से तवांग की 450 किमी की यात्रा शुरू की तो लगा जैसे सभ्यता और प्रकृति दोनों हमारी परीक्षा ले रहे हों, पर रास्ते में दिखते सेना के कैंप, जवानों की चौकस निगाहें और उनका अनुशासन एक मजबूत सुरक्षा घेरे का एहसास दिलाते रहे। पहाड़ों को चीरती बीआरओ द्वारा बनाई गई चौड़ी, मजबूत सड़कें हर मोड़ पर यही बता रही थीं, कि देश की अंतिम सीमाओं का रास्ता भी उतना ही दुलार पाता है, जितना बड़ी-बड़ी महानगरों की सड़कें।
विकास: सीमा की कठोर जलवायु में भी रफ्तार पर
तवांग की ओर बढ़ते हुए एहसास हुआ कि सेना सिर्फ देश की रक्षा नहीं कर रही, वह यहां के लोगों के जीवन में भी नई रोशनी ला रही है।
ईटानगर से लेकर बमडीला, दीरांग, तवांग और आगे बुमला तक घाटियों में नए पुल, पक्की सड़कें और सुरक्षित मार्ग इन इलाकों के कठिन जीवन को आसान बना रहे हैं।
स्थानीय लोग कहते हैं, पहाड़ों में डगमगाती सड़कों का समय अब गया… सेना और बीआरओ ने इन्हें जीवनरेखा बना दिया है।
सेना: जंगलों की संरक्षक भी…
असम सीमा क्षेत्र से गुजरते हुए एक अद्भुत दृश्य मिला, यहां सेना केवल बंदूकें नहीं संभालती, बल्कि जंगल भी बचाती है।
134 इन्फैंट्री बटालियन (प्रादेशिक सेना) पिछले सात वर्षों से जंगल पुनर्जीवन के काम में अग्रसर है।
लामा कैंप में मिले मेजर विजय कन्हैया अग्रवाल: छत्तीसगढ़ के कोरबा के रहने वाले। अपने प्रदेश के लोगों को देखकर जैसे उनमें एक अलग ही अपनापन उमड़ पड़ा। उन्होंने बताया कि कैसे सैनिक यहां हजारों पौधे रोपते हैं, जल-स्रोतों को सुरक्षित रखते हैं और पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी को बेहतर बनाने में जुटे हैं।
सेना कैंटीन: दूर-दराज़ में भी अपनापन
सेला पास और जसवंतगढ़ की सेना कैंटीनों में आम नागरिकों का आना-जाना लगा रहता है।
पर्यटक वहां से सेना के प्रतीक वाले कपड़े और छोटे गिफ्ट आइटम लेकर लौटते हैं, जैसे इलाके की कठिनाइयों के बीच एक छोटी-सी याद जो दिल में गर्व जगाती है।
बुमला बॉर्डर: जहां हर हवा में वीरता की गूंज
तवांग से करीब 40 किमी और तीन घंटे की यात्रा के बाद बर्फीली हवाओं के बीच जब बुमला बॉर्डर नज़र आता है तो लगता है, जैसे देश की धड़कन यहां तेज़ी से चल रही हो।
यहां का तापमान इन दिनों 3 से 4 डिग्री के बीच है। भारतीय सेना के जवान शून्य से भी नीचे ठंड में 24 घंटे सीमा की पहरेदारी करते हैं।
जवान बताते हैं कि भारत-चीन सीमा कुल 3488 किमी लंबी है, लेह से लेकर अरुणाचल की गहराइयों तक। और इस पूरी लंबाई पर भारतीय सेना की नजर एक पल के लिए भी नहीं फिसलती।
रणनीतिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक, तीनों रूपों में अहम…
बुमला दर्रा: सिर्फ एक बॉर्डर नहीं, बल्कि 1962 के युद्ध की स्मृतियों का स्थल, आज की सैन्य चौकसी का केंद्र और भारत-चीन की सीमा कार्मिक बैठक (बीपीएम) का अहम स्थान है।
यहां पहुंचने के लिए तवांग के उपायुक्त कार्यालय से विशेष परमिट लेना पड़ता है। और आगे की यात्रा सिर्फ स्थानीय एसयूवी से ही संभव होती है।
जोगिंदर सिंह: बुमला की सबसे चमकदार कथा
बुमला की धरती का ज़िक्र साहस की उन कहानियों के बिना अधूरा है, जिनमें सबसे ऊंचा नाम है, सूबेदार जोगिंदर सिंह, परमवीर चक्र
23 अक्टूबर 1962 तीन दिशाओं से आए चीनी हमलों के बीच 20 सिख सैनिकों की छोटी टुकड़ी…गोला-बारूद खत्म… टेलीफोन लाइन काट दी गई… और फिर भी वीर जोगिंदर सिंह ने पीछे हटने के बजाय संगीनों से चीनी सेना को धकेलने का आदेश दिया।
खुद घायल होने के बावजूद उन्होंने अकेले 52 से अधिक चीनी सैनिकों को मार गिराया।
अंततः भारी स्वचालित गोलाबारी में वे और उनके साथी शहीद हुए, पर दुश्मन के दिल में ऐसा भय बसा गए कि पहाड़ आज भी उनकी वीरता की गूंज से भरे लगते हैं।
चीन ने भी इस शूरवीरता को स्वीकार किया और मई 1963 में उनकी अस्थियां सैन्य सम्मान के साथ भारत को लौटाईं।
बुमला और मोगा—दोनों जगह आज उनके स्मारक खड़े हैं। हर साल उनकी स्मृति में कार्यक्रम होते हैं।
आज का बुमला, जहां चौकसी है, शांति की उम्मीद है और शौर्य की अनंत कहानियां
भारतीय सेना की नजर एलएसी पर एक पल के लिए भी नहीं हटती। बर्फ, पहाड़, हवा, सब बदलते हैं, पर जवानों का साहस नहीं। बुमला दर्रा सिर्फ सीमा नहीं, यह भारत के जज़्बे का, सैन्य साहस का और देशभक्ति की सबसे ऊंची मिसालों का जीता-जागता प्रतीक है।
