चने के बाद अब गुड़ की बारी! नान में फिर ‘चहेती कंपनियों’ को उपकृत करने की तैयारी?

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खुली प्रतिस्पर्धा से शासन को करोड़ों का फायदा, फिर भी सीमित निविदा पर उठ रहे सवाल
रायपुर।

नागरिक आपूर्ति निगम (नान) में चना खरीदी को लेकर उठा विवाद अभी पूरी तरह थमा भी नहीं है कि अब गुड़ खरीदी की प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि जिस तरह चना खरीदी में कुछ चुनिंदा फर्मों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई थी, उसी तर्ज पर अब गुड़ आपूर्ति के लिए भी पूर्व निर्धारित कंपनियों को उपकृत करने की तैयारी की जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, रायपुर की दो और तमिलनाडु की एक कंपनी को निविदा प्रक्रिया में लाभ पहुंचाने की कवायद चल रही है। भले ही इन कंपनियों के नाम अलग-अलग हों, लेकिन बाजार में लंबे समय से इनके एक साथ काम करने की चर्चा होती रही है। इस बीच व्यापारिक संगठनों और अन्य आपूर्तिकर्ताओं ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जतानी शुरू कर दी है।
चना निविदा में विरोध के बाद बदले थे कदम
जानकार बताते हैं कि चना खरीदी के दौरान भी प्रारंभिक स्तर पर सीमित कंपनियों को अवसर देने की कोशिश हुई थी। लेकिन प्रदेश की प्रमुख व्यापारिक फर्मों ने इसका विरोध किया, जिसके बाद नान को अपने कदम पीछे खींचने पड़े और निविदा प्रक्रिया सभी पात्र कंपनियों के लिए खोलनी पड़ी।
इस निर्णय का सीधा फायदा शासन को मिला। दावा किया जा रहा है कि यदि निविदा केवल चुनिंदा कंपनियों तक सीमित रहती तो बाजार मूल्य की तुलना में प्रति किलो 25 से 30 रुपये तक अधिक दर पर खरीदी होती। खुली प्रतिस्पर्धा के कारण लगभग 18 लाख मीट्रिक टन चने की खरीदी में शासन को करीब 80 करोड़ रुपये की बचत हुई।
गुड़ खरीदी में भी दोहराई जा सकती है कहानी
अब गुड़ खरीदी को लेकर भी वही आशंका जताई जा रही है। बाजार में गुड़ का थोक मूल्य सामान्यतः 38 से 42 रुपये प्रति किलो के बीच बताया जा रहा है, जबकि पूर्व की निविदाओं में 60 रुपये या उससे अधिक की दरें स्वीकृत होने की चर्चा है। यदि ऐसा होता है तो शासन को हर वर्ष करोड़ों रुपये का अतिरिक्त वित्तीय भार उठाना पड़ सकता है।
व्यापारिक हलकों में यह भी चर्चा है कि पर्दे के पीछे कमीशनखोरी का एक संगठित तंत्र वर्षों से सक्रिय है, जिसे प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन निविदा प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों ने पारदर्शिता पर बहस जरूर तेज कर दी है।
सबसे बड़ा सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक धन से होने वाली खरीदी में अधिक से अधिक प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना शासन के हित में होता है। खुली निविदा से जहां बेहतर दरें मिलती हैं, वहीं पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ती है।
अब निगाहें शासन और नान प्रबंधन पर टिकी हैं। देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी और नीति-निर्माता इन सवालों पर संज्ञान लेते हैं या फिर वर्षों से चली आ रही व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया जाता है। चने के बाद गुड़ खरीदी को लेकर उठे ये सवाल आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बन सकते हैं।

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