प्लेसमेंट कर्मचारियों का वेतन नहीं मिलने पर शासन के नाम पत्र, जरूर पढ़िए…
रायपुर।
मैं एक प्लेसमेंट कर्मचारी हूँ। मेरे जैसे हजारों-लाखों युवा राज्य शासन के अलग-अलग विभागों में वर्षों से अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। हम भी रोज़ समय पर कार्यालय पहुँचते हैं, अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी ईमानदारी से निभाते हैं, जनता के काम करते हैं और शासन की योजनाओं को ज़मीन तक पहुँचाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब महीने के अंत में वेतन की बात आती है, तो ऐसा लगता है जैसे हमारी मेहनत की कोई कीमत ही नहीं है।
मुझे हर महीने केवल 10 से 20 हजार रुपये के बीच वेतन मिलता है। यह राशि भी कोई बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन यही मेरे परिवार की उम्मीद है, यही मेरे घर का चूल्हा जलाती है और इसी से मेरी पूरी दुनिया चलती है। सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं कि वेतन कम है, बल्कि यह है कि वह समय पर भी नहीं मिलता। कभी तीन महीने, कभी चार महीने तक वेतन रोक दिया जाता है। इतने लंबे समय तक बिना वेतन के काम करना हमारी मजबूरी बन जाती है।
क्या कभी किसी ने सोचा है कि इन महीनों में हम कैसे जीते होंगे? हर सुबह ऑफिस जाने के लिए बाइक में पेट्रोल डालने तक के पैसे नहीं होते। जेब खाली होती है, लेकिन फिर भी चेहरे पर मुस्कान रखकर ड्यूटी पर पहुँचना पड़ता है। कई बार घर से निकलते समय यह चिंता रहती है कि आज ऑफिस कैसे पहुँचूँगा।
सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब नौकरी करने के बावजूद अपने ही माता-पिता से पैसे माँगने पड़ जाएँ। मन नहीं करता कि पिता से कहूँ, “पापा, कुछ पैसे दे दीजिए।” क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका बेटा नौकरी करता है और अब आत्मनिर्भर है। माँ सोचती हैं कि बेटा कमाता है तो घर की जिम्मेदारियों में हाथ बँटाएगा। बहन की छोटी-छोटी इच्छाएँ होती हैं कि भाई कभी उसके लिए कोई उपहार लाएगा, उसे बाहर खाना खिलाएगा। लेकिन मैं हर बार मजबूरी के सामने हार जाता हूँ। दिल चाहता है कि अपनों की खुशियाँ पूरी करूँ, लेकिन जेब की खामोशी हर सपना तोड़ देती है।
सबसे दुखद बात यह है कि चार-चार महीने तक वेतन न मिलने के बावजूद हमसे पूरी ईमानदारी और समयबद्ध तरीके से काम की उम्मीद की जाती है। क्या कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि यह सोच सकता है कि बिना वेतन के उसका परिवार इतने दिन कैसे चलेगा? क्या वे खुद या अपने बेटे-बेटी को ऐसी नौकरी करने देंगे, जहाँ महीनों तक वेतन ही न मिले?
राज्य शासन के विभागों में ठेकेदारी और प्लेसमेंट व्यवस्था के नाम पर आखिर कब तक कर्मचारियों का भविष्य दाँव पर लगाया जाएगा? हम भी इंसान हैं। हमारे भी परिवार हैं, जिम्मेदारियाँ हैं, सपने हैं। हमारी भी बिजली का बिल आता है, बच्चों की स्कूल फीस जमा करनी होती है, घर का राशन खरीदना होता है, दवाइयाँ लेनी होती हैं। ये सब चार महीने तक इंतजार नहीं करते।
मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि सभी अधिकारी एक जैसे नहीं होते। विभागों में कुछ ऐसे संवेदनशील अधिकारी भी हैं जो हमारी पीड़ा को समझते हैं। वे समय-समय पर संबंधित एजेंसियों और अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि प्लेसमेंट कर्मचारियों का वेतन समय पर दिया जाए। कई जनप्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे को उठाया है और कहा है कि छोटे कर्मचारियों का वेतन समय पर मिले, ताकि उनका घर-परिवार ठीक से चल सके और वे मन लगाकर काम कर सकें।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ अधिकारी और ठेकेदार इन निर्देशों को गंभीरता से नहीं लेते। कमीशन, फाइलों और औपचारिकताओं के बीच हमारी ज़िंदगी कहीं खो जाती है। शायद उन्हें यह एहसास नहीं कि वेतन में हर दिन की देरी किसी कर्मचारी के घर में चिंता, तनाव और आर्थिक संकट को और गहरा कर देती है।
मैं कोई विशेष सुविधा नहीं माँग रहा। मैं सिर्फ अपने पसीने की कमाई समय पर माँग रहा हूँ। मैं सम्मान से जीने का अधिकार माँग रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी मेहनत की कीमत समय पर मिले, ताकि मैं अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभा सकूँ, अपने माता-पिता की आँखों में गर्व देख सकूँ और अपने बच्चों या भाई-बहनों के सपनों को पूरा करने की कोशिश कर सकूँ।
मैं सिर्फ एक प्लेसमेंट कर्मचारी नहीं हूँ। मैं भी इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हूँ। मेरी भी भावनाएँ हैं, मेरी भी मजबूरियाँ हैं, मेरा भी आत्मसम्मान है। उम्मीद है कि शासन, प्रशासन और समाज हमारी इस आवाज़ को सुनेगा और ऐसा सिस्टम बनाएगा, जहाँ किसी भी कर्मचारी को अपनी मेहनत की कमाई के लिए महीनों तक इंतजार न करना पड़े।
